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Showing posts from October, 2015

कविता : "वाह पैसा !!"

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पैसे की हाय कैसी कहानी , जिसके पास जितनी , उसने उतनी है चाही , पैसे की हाय कैसी कहानी। पैसे ने है बांटा इंसान को , आँगन को , घर - बार को , यहाँ तक ना छोड़ा सन्तान को , पैसे ने इंसान को शैतान बनाया , हाथों में खंजर और पुण्य धरती को क़ब्रिस्तान बनाया। पैसे की हाय कैसी कहानी , जिसके पास जितनी , उसने उतनी है चाही। मित्र ने मित्र को लूटा , नौकर से ना मालिक छूटा , आतंक की ये कैसी घनघोर छाया , जाने इस पैसे की क्या है माया , पैसे की ये रीत पुरानी , ना इसकी माया कैकई समझी और ना ही दुर्योधन ने जानी , यही स्वरुप समाज बदला , देख कर पानी खुद को दलदल में धकला। पैसे की हाय कैसी कहानी। पैसे बनाने की होर में लगे हम , जन्मे ना जाने कितने मुजरिम , भ्रष्टाचार , दहेज़ है इसी का परिणाम , जो आज कर रहे इंसानियत को बदनाम , और ना जाने कितनी है इसकी जन्मकुंडली , सब लिखने बैठूं तो कागज़ भी पर जाए बिकनी।  पैसे की हाय कैसी कहानी , जिसके पास जितनी , उसने उतनी है चाही। पर इसे हँसी में मत उड़ाना , ए  मेरे दोस्त ! मेरी विचार समझना , पैसे ने दिया ही क्या , खुशियाँ ...

कविता : "मेरे साथ क्यों ?"

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(बढ़ती जनसंख्या और घटता स्त्री - पुरुष अनुपात एक जानी पहचानी समस्या  है। इस विराट भारत की एक और कहानी है , बलात्कार की जो आज आये दिन अखबारों में पढ़ने को मिल जाएगी । ये कैसी मानशिक प्रवृति है जो औरत को मनुष्य नहीं केवल वस्तु मात्र समझता है। इस अभर्द्र और घिनौने अपराध में बच्चे , बूढ़े , जवान , अपंग, इत्यादि सभी उम्र की लड़कियाँ शिकार होती रहती है। आवाज़ उठाने के बावजूद समय पर सभी को न्याय नहीं मिल पाता किन्तु उनके अंदर हो रही हलचल, भय , पीड़ा के बारे में किसीको मालूम नहीं पड़ता।  ये कविता  उनके अंदर उठ रहे कई सवालो को शब्दों में पिरोने की छोटी प्रयास  मात्र है। ) किस  बात की पुकार है , कैसा ये हाहाकार है , मिट गया है वजूद मेरा , नहीं कुछ  भी बाकी है , पूछता मेरा मन सिर्फ एक सवाल हैं , "मेरे साथ क्यों ?" दर्द की तूफ़ान में , दबी दबी सी रात है , दिन की रोशनी में भी , चुभती हुई सी बात हैं , कभी - कभी चिल्ला उठूँ , कभी - कभी घबराती हूँ , आज़ तो खुद के साये से भी डर जाती हूँ।  कि एक ऐसी आंधी आई क...