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Showing posts from October, 2016

"मेरा चंद्रबिंदु "

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(चंद्रबिंदु - शब्दों की ऐसी शोभा जो केवल लिखने भर तक सीमित थी , आज मेरी कविता का ऐसा नायक है जो  अपनी प्रासिंगता बता रहा हैं।  ये शब्दों  के ऊपर लहलहाता है और एक छिपा हुआ ज्ञान दे जाता हैं । सबके जीवन में सफलता - विफलता होती है  और समय भी एक जैसा नहीं होता।  वैसे ही परिस्थिति  में तनाव घर कर लेता है और हमें दीमक की तरह अंदर से खोखला बना डालता हैं। अतः हमें अपने जीवन के सफलता , गुण , प्रतिभा रूपी चंद्रबिंदु को सदैव याद रखना चाहिए ताकि बुरे समय में भी खुद पर किया गया भरोसा और धैर्य, हमसे अच्छे समय का निर्माण कराए।) चमकते ललाट पर शोभा देता हूँ। नीचे उतारो तो आधा दीखता हूँ। मेरा स्वर गुंजेयमान  और आकार है गोल सामान। मैं सिर्फ बिंदु नहीं , मैं हूँ "चंद्रबिंदु" का अभिमान। हर मनुष्य के जीवन में मेरा अश्क हैं , सफलता बन , मैं उसके अँधेरे - अधुरे समय में बिंदु बन चमकता हूं , इस आस में कि काले बादल जीवन के हट जाएंगे , और आशा की किरण , मुझसे अपना श्रृंगार करेगी , मैं निराशा का उस योद्धा की तरह वार करूँगा ...

"प्यारा सपना "

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(यह एक बहुत ही सामान्य सी भावनओं को दर्शाती हुईं कविता हैं। आँखें बंद करते ही हमें सपने दीखते है जो उठती आँखों के साथ धुंदले हो जाते है। हर उम्र के लोग के सपने देखने का अगल अर्थ होता है यहाँ तक की विभिन्न सपनों के विभिन्न अर्थ होते हैँ। सपने कई ऐसे होते है जिन्हें पूरा करना जीवन का उद्देश्य बन जाता है इसलिए सपने देखे ऐसे जो आपके भविष्य को उज्वल कर दे। ) मैंने भी देखा है एक सपना , कुछ अधुरा , कुछ पूरा , कितना सजीला , कितना चमकीला। सोते ही अपने सपनो की शैय्या पर , सुन्दर स्वप्न की टोली घूमने लगी अपनी नैय्या पर , देखा मैंने युद्धकाल के शौर्य जवानों को , कुछ किसानों , तो कुछ मेजबानों को , सुना मैंने क्रिकेट का शोर , और देखा फिल्मों  के लिए लोगों की होर , कितना प्यारा , कितना काल्पनिक था , ये सपना नहीं , मानो मार्मिक था , कभी मैंने विदेश को देखा तो कभी देश को , कई लोगों को और उनके कई रूप को देखा , कितना छलावा , कितना नकलीपन था, पर मेरी दुनिया के पास तो रोमांच और सचाई भड़ा मन था। हर बेला को छूता , हर सरगम को गाता , प्रकृति के साथ खुद को नचाता , खुद क...

"दुनिया" - एक कटी आलोचना

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(इस कविता का उद्देश्य समाज के बदलते रूप में बदलते लोगो की कहानी हैं। हम वास्तव में खुद से ज्यादा दूसरो की सुनते हैं और "लोग क्या कहेंगे" में उलझा लेते हैं। कविता में "मुनिया " उन सभी को संबोधित करती  है जो मेहनत कर एक - एक पैसे को कमाते है और "दुनिया" उस संमाज के लोगो को जो केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचते है और मुनिया को बदलने पर विवश कर देते हैं। अंततः जीत सिर्फ डार्विन के उस सिद्धान्त की होती है, जो कहता है - " survival of the fittest" । जानना ये जरुरी है की हमे अपने अधिकारों का बोध है या नहीं क्योंकि अधूरे ज्ञान से बेहतर है शांत रहा जाए और सीख कर आगे बढ़ा जाए। ) एक थी मुनिया और दूजी सारी दुनिया , मुनिया सोची घड़े बेच कर पैसे कमाएगी , पर नहीं जानती थी दुनिया उसकी हँसी उड़ाएगी , कैसे वे घड़े को बेचे , सोच में वो डूब गई , एक घड़े को पाँच में देगी , ऐसा फैसला कर गई। वो बेचारी नन्ही सी जान , दुनिया को नहीं होता उसपर शान , सुबह - सुबह वो बैठी , ला घड़े को रख , लोग इधर से गुजरे , पर नहीं आए एक वक़्त , एक ग्राहक आया, इसी ओर , उसे चाहिए...