"मेरा चंद्रबिंदु "
(चंद्रबिंदु - शब्दों की ऐसी शोभा जो केवल लिखने भर तक सीमित थी , आज मेरी कविता का ऐसा नायक है जो अपनी प्रासिंगता बता रहा हैं। ये शब्दों के ऊपर लहलहाता है और एक छिपा हुआ ज्ञान दे जाता हैं । सबके जीवन में सफलता - विफलता होती है और समय भी एक जैसा नहीं होता। वैसे ही परिस्थिति में तनाव घर कर लेता है और हमें दीमक की तरह अंदर से खोखला बना डालता हैं। अतः हमें अपने जीवन के सफलता , गुण , प्रतिभा रूपी चंद्रबिंदु को सदैव याद रखना चाहिए ताकि बुरे समय में भी खुद पर किया गया भरोसा और धैर्य, हमसे अच्छे समय का निर्माण कराए।) चमकते ललाट पर शोभा देता हूँ। नीचे उतारो तो आधा दीखता हूँ। मेरा स्वर गुंजेयमान और आकार है गोल सामान। मैं सिर्फ बिंदु नहीं , मैं हूँ "चंद्रबिंदु" का अभिमान। हर मनुष्य के जीवन में मेरा अश्क हैं , सफलता बन , मैं उसके अँधेरे - अधुरे समय में बिंदु बन चमकता हूं , इस आस में कि काले बादल जीवन के हट जाएंगे , और आशा की किरण , मुझसे अपना श्रृंगार करेगी , मैं निराशा का उस योद्धा की तरह वार करूँगा ...