"मेरे जीवनसाथी "
(इस कविता को मैं अपने प्रमुख़ रचनाओं में से एक कहुँ तो गलत नहीं होगा। अकसर बातें जवानों की होती हैं परन्तु जवान अकेला नहीं जाता हैं किसी के जीवन के रंग भी उसके साथ जाते हैं। इस कविता के माध्यम से मैं उनके जीवनसंगिनी की भावनाओं को शब्दों से बयां करने का केवल कल्पना मात्र प्रयास की हूं। उम्मीद हैं थोड़े से कुछ अंश उनकी भावनाओं के जुबान बन रहे हो। देश की रक्षा उन जवानों के कंधो पर होती हैं और घर की कमान उनके साथी के। कई बातें दोनों के बीच अधूरी रह गयी हो और कई इक्षाएं बेजुबा। ऐसी कुछ बंधन भी दिखाती हैं कविता "मेरे जीवनसाथी " । ) दिन - रात तकती मेरी आँखें , की कब चौखट पे पैर रखो। सज - सवर रखती खुदको , की कब तोरी नज़र परे मुझको। तेरी खाखी वर्दी में , छाती है फौलाद का , आँखें तेरी खोजे मुझे , जब तम्मना हो औलाद का , जानू तेरी नौकरी , मुझे ना भाएगी , तेरे ना होने का दर्द , मुझे हमेशा सताएगी। ओ 'मेरे साथी ', फिर भी मैं उम्मीद रखूँगी , कि जल्द तू आएगा , कभी सिर्फ मेरे खातिर , तेरी पहली नज़र , मेरे सिंगार पर पड़ेगी , उस फौलाद से सीने में , तू मुझे भरेगा ,...