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Showing posts from February, 2017

"मेरे जीवनसाथी "

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(इस कविता को मैं अपने प्रमुख़ रचनाओं में से एक कहुँ तो गलत नहीं होगा। अकसर बातें जवानों की होती हैं परन्तु जवान अकेला नहीं जाता हैं किसी के जीवन के रंग भी उसके साथ जाते हैं। इस कविता के माध्यम से मैं उनके जीवनसंगिनी की भावनाओं को शब्दों से बयां करने का केवल कल्पना मात्र प्रयास की हूं। उम्मीद हैं थोड़े से कुछ अंश उनकी भावनाओं के जुबान बन रहे हो। देश की रक्षा उन जवानों के कंधो पर होती हैं और घर की कमान उनके साथी के। कई बातें दोनों के बीच अधूरी रह गयी हो और कई इक्षाएं बेजुबा। ऐसी कुछ बंधन भी दिखाती हैं कविता "मेरे जीवनसाथी " । ) दिन - रात तकती मेरी आँखें , की कब चौखट पे पैर रखो। सज - सवर रखती खुदको , की कब तोरी नज़र परे मुझको। तेरी खाखी वर्दी में , छाती है फौलाद का , आँखें तेरी खोजे मुझे , जब तम्मना हो औलाद का , जानू तेरी नौकरी , मुझे ना भाएगी , तेरे ना होने का दर्द , मुझे हमेशा सताएगी। ओ 'मेरे साथी ', फिर भी मैं उम्मीद रखूँगी , कि जल्द तू आएगा , कभी सिर्फ मेरे खातिर , तेरी पहली नज़र , मेरे सिंगार पर पड़ेगी , उस फौलाद से सीने में , तू मुझे भरेगा ,...

"तीन शब्द तलाक़ के"

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(मेरे इस लिखें कविता के शीर्षक से लक्षित हैं की बातें तलाक़ की हो रही हैं। "तीन शब्द तलाक़ के" - से मेरा अभिप्राय हमारे मुस्लिम समाज के तलाक़ लेने के तरीक़े को एक औरत के दृष्टिकोण से समझाया गया हैं। आज के तेज़ी से भागती ज़िन्दगी में जो बदलते समय में काफी तेजी से बदल रहा - ऐसे में अगर महिलाएं बदलाव का लाभ ना उठा सके तो उस तरक़्क़ी को हाय हैं ! तीन शब्द तलाक़ के , हमारे समाज में महिलायों को पुरुषों से हीन , भयभीत और आधीन बनाता हैं। वास्तव में आज भी मुस्लिम समाज का बहुत कम वर्ग ही असल तरक़्क़ी का स्वाद चख सका हैं। अब भी काफी आबादी अज्ञानता , धार्मिक बंधन , रूढ़िवादिता और महिलायों को केवल परदे के पीछे ही देखना चाहता हैं। किसी भी धर्म में अगर महिलायों पर बंधन लगाया जाए , उससे उनकी असहजता साफ़ लक्षित होती हैं। हमारे समाज को बदलाव की जरुरत हमेशा पड़ेगी क्योंकि बदलाव सिर्फ़ मानसिक बदलाव से लाया जा सकता हैं। तलाक़ शब्द बहुत छोटा हैं परन्तु इसके प्रभाव असल ज़िन्दगी को अंदर से झंझोर देते हैं। इसमें दोनों ही पक्ष को मानसिक तौर पर चोट लगती हैं। ग़लती चाहे एक ही पक्ष की हो मगर ज़िन्दगी दो की ...