कविता - "प्रकृति"
(इस कविता को मैंने प्रकृति और मानव जाति के बीच के वार्तालाप के रूप में दर्शाया है।) (प्रकृति का मानव जाति से वार्तालाप ) रच बस सकती हूँ , मैं उजड़ भी सकती हूँ , हे मानव ! मुझको पहचानो , क्योंकि मैं बदल भी सकती हूँ। कूट -कूट कर रस भरा है मुझमें , ले लो और पहचानो , शक्ति है ऐसी तुझमें , वक़्त निकलने से पहले मुझको जानो। मुझमें ही परमेश्वर है , मुझमें ही धरती और अम्बर है , मत करो बर्बाद हमें , हमने किया है आबाद तुम्हें। हरियाली हमसे होती है , खुशहाली हमसे होती है , हमें चाहोगे तो धरती है सोना , नाश करोगे तो तुम्हें पड़ेगा सब कुछ खोना। कुछ नहीं है बीता ,बचा हुआ है वक़्त , इससे पहले की हम हो जाए सख़्त , बहा दो हमारे लिए रक्त। तभी देंगे तुम्हें छाया हर वक़्त। हमें बर्बाद करना छोड़ दो , अपने हाथो को रोक लो , इससे पहले कि हम बरस पड़े , अग्नि में तुम्हें भस्म करे , हमें तुम पहचानो , वक़्त निकलने से पहले हमें जानो। (मानव का प्रकृति से वार्तालाप ) थक कर मैं हार गया , इस प्रकृति ने हमें मार दिया , भूल हुई जो मानी ना चेतावनी , और हमने कर ली ए...