कविता : "मैं एक छोटी सी बात"
( हमारी ज़िन्दगी में छोटी बातों का बड़ा योगदान होता हैं, चाहे वो नए आविष्कार के लिए हो या फिर परिवार में तकरार के लिए। इस कविता में मेरा गंतव् सामाजिक दृश्टिकोण से है जो रिश्तों में तनाव ले आता हैं और जब इसका हल निकलता है तो पता चलता है की कोई बात थी ही नहीं , मगर तब तक चीज़े बिगड़ चुकी होती हैं। पूरे कविता का सार अगर चार पंक्ति में लिखना हो तो ये कुछ ऐसा होगा : एक छोटी सी बात का बन गया बबाल , जीवन बीत ना जाए करते मलाल , इससे बचाव हैं जरुरी , समझ - बूझ की तैयारी कर लो पूरी। ) हूँ मैं एक छोटी सी बात , पर बदल लेती हूँ अपनी आकार , भूल मत करना समझ कर, कि मैं हूँ बेकार , कितने घरों को तोड़ा है हमने, कर के हुंकार , समझना ना सिर्फ हमें एक छोटी सी बात। मैं नहीं बोलती , मेरे लिए सब है बोलते , सब बोलों को जोड़ कर बनती हूँ मैं बड़ी सी बात , उम्र ना देखूं , ना ही देखूं घर का प्यार , एक पल में आँसूं दूँ और कर दूँ अपनों को तार - तार , समझ बूझ की ना होती है हथयार , छीन लेती हूँ , जब बनती हूँ मैं छोटी से बड़ी बात। फिर सब कोसे मुझको, क्यों मैं आई मिटाने ये प्यार , मैं...