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"मेरे जीवनसाथी "

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(इस कविता को मैं अपने प्रमुख़ रचनाओं में से एक कहुँ तो गलत नहीं होगा। अकसर बातें जवानों की होती हैं परन्तु जवान अकेला नहीं जाता हैं किसी के जीवन के रंग भी उसके साथ जाते हैं। इस कविता के माध्यम से मैं उनके जीवनसंगिनी की भावनाओं को शब्दों से बयां करने का केवल कल्पना मात्र प्रयास की हूं। उम्मीद हैं थोड़े से कुछ अंश उनकी भावनाओं के जुबान बन रहे हो। देश की रक्षा उन जवानों के कंधो पर होती हैं और घर की कमान उनके साथी के। कई बातें दोनों के बीच अधूरी रह गयी हो और कई इक्षाएं बेजुबा। ऐसी कुछ बंधन भी दिखाती हैं कविता "मेरे जीवनसाथी " । ) दिन - रात तकती मेरी आँखें , की कब चौखट पे पैर रखो। सज - सवर रखती खुदको , की कब तोरी नज़र परे मुझको। तेरी खाखी वर्दी में , छाती है फौलाद का , आँखें तेरी खोजे मुझे , जब तम्मना हो औलाद का , जानू तेरी नौकरी , मुझे ना भाएगी , तेरे ना होने का दर्द , मुझे हमेशा सताएगी। ओ 'मेरे साथी ', फिर भी मैं उम्मीद रखूँगी , कि जल्द तू आएगा , कभी सिर्फ मेरे खातिर , तेरी पहली नज़र , मेरे सिंगार पर पड़ेगी , उस फौलाद से सीने में , तू मुझे भरेगा ,...

"तीन शब्द तलाक़ के"

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(मेरे इस लिखें कविता के शीर्षक से लक्षित हैं की बातें तलाक़ की हो रही हैं। "तीन शब्द तलाक़ के" - से मेरा अभिप्राय हमारे मुस्लिम समाज के तलाक़ लेने के तरीक़े को एक औरत के दृष्टिकोण से समझाया गया हैं। आज के तेज़ी से भागती ज़िन्दगी में जो बदलते समय में काफी तेजी से बदल रहा - ऐसे में अगर महिलाएं बदलाव का लाभ ना उठा सके तो उस तरक़्क़ी को हाय हैं ! तीन शब्द तलाक़ के , हमारे समाज में महिलायों को पुरुषों से हीन , भयभीत और आधीन बनाता हैं। वास्तव में आज भी मुस्लिम समाज का बहुत कम वर्ग ही असल तरक़्क़ी का स्वाद चख सका हैं। अब भी काफी आबादी अज्ञानता , धार्मिक बंधन , रूढ़िवादिता और महिलायों को केवल परदे के पीछे ही देखना चाहता हैं। किसी भी धर्म में अगर महिलायों पर बंधन लगाया जाए , उससे उनकी असहजता साफ़ लक्षित होती हैं। हमारे समाज को बदलाव की जरुरत हमेशा पड़ेगी क्योंकि बदलाव सिर्फ़ मानसिक बदलाव से लाया जा सकता हैं। तलाक़ शब्द बहुत छोटा हैं परन्तु इसके प्रभाव असल ज़िन्दगी को अंदर से झंझोर देते हैं। इसमें दोनों ही पक्ष को मानसिक तौर पर चोट लगती हैं। ग़लती चाहे एक ही पक्ष की हो मगर ज़िन्दगी दो की ...

"मेरा चंद्रबिंदु "

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(चंद्रबिंदु - शब्दों की ऐसी शोभा जो केवल लिखने भर तक सीमित थी , आज मेरी कविता का ऐसा नायक है जो  अपनी प्रासिंगता बता रहा हैं।  ये शब्दों  के ऊपर लहलहाता है और एक छिपा हुआ ज्ञान दे जाता हैं । सबके जीवन में सफलता - विफलता होती है  और समय भी एक जैसा नहीं होता।  वैसे ही परिस्थिति  में तनाव घर कर लेता है और हमें दीमक की तरह अंदर से खोखला बना डालता हैं। अतः हमें अपने जीवन के सफलता , गुण , प्रतिभा रूपी चंद्रबिंदु को सदैव याद रखना चाहिए ताकि बुरे समय में भी खुद पर किया गया भरोसा और धैर्य, हमसे अच्छे समय का निर्माण कराए।) चमकते ललाट पर शोभा देता हूँ। नीचे उतारो तो आधा दीखता हूँ। मेरा स्वर गुंजेयमान  और आकार है गोल सामान। मैं सिर्फ बिंदु नहीं , मैं हूँ "चंद्रबिंदु" का अभिमान। हर मनुष्य के जीवन में मेरा अश्क हैं , सफलता बन , मैं उसके अँधेरे - अधुरे समय में बिंदु बन चमकता हूं , इस आस में कि काले बादल जीवन के हट जाएंगे , और आशा की किरण , मुझसे अपना श्रृंगार करेगी , मैं निराशा का उस योद्धा की तरह वार करूँगा ...

"प्यारा सपना "

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(यह एक बहुत ही सामान्य सी भावनओं को दर्शाती हुईं कविता हैं। आँखें बंद करते ही हमें सपने दीखते है जो उठती आँखों के साथ धुंदले हो जाते है। हर उम्र के लोग के सपने देखने का अगल अर्थ होता है यहाँ तक की विभिन्न सपनों के विभिन्न अर्थ होते हैँ। सपने कई ऐसे होते है जिन्हें पूरा करना जीवन का उद्देश्य बन जाता है इसलिए सपने देखे ऐसे जो आपके भविष्य को उज्वल कर दे। ) मैंने भी देखा है एक सपना , कुछ अधुरा , कुछ पूरा , कितना सजीला , कितना चमकीला। सोते ही अपने सपनो की शैय्या पर , सुन्दर स्वप्न की टोली घूमने लगी अपनी नैय्या पर , देखा मैंने युद्धकाल के शौर्य जवानों को , कुछ किसानों , तो कुछ मेजबानों को , सुना मैंने क्रिकेट का शोर , और देखा फिल्मों  के लिए लोगों की होर , कितना प्यारा , कितना काल्पनिक था , ये सपना नहीं , मानो मार्मिक था , कभी मैंने विदेश को देखा तो कभी देश को , कई लोगों को और उनके कई रूप को देखा , कितना छलावा , कितना नकलीपन था, पर मेरी दुनिया के पास तो रोमांच और सचाई भड़ा मन था। हर बेला को छूता , हर सरगम को गाता , प्रकृति के साथ खुद को नचाता , खुद क...

"दुनिया" - एक कटी आलोचना

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(इस कविता का उद्देश्य समाज के बदलते रूप में बदलते लोगो की कहानी हैं। हम वास्तव में खुद से ज्यादा दूसरो की सुनते हैं और "लोग क्या कहेंगे" में उलझा लेते हैं। कविता में "मुनिया " उन सभी को संबोधित करती  है जो मेहनत कर एक - एक पैसे को कमाते है और "दुनिया" उस संमाज के लोगो को जो केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचते है और मुनिया को बदलने पर विवश कर देते हैं। अंततः जीत सिर्फ डार्विन के उस सिद्धान्त की होती है, जो कहता है - " survival of the fittest" । जानना ये जरुरी है की हमे अपने अधिकारों का बोध है या नहीं क्योंकि अधूरे ज्ञान से बेहतर है शांत रहा जाए और सीख कर आगे बढ़ा जाए। ) एक थी मुनिया और दूजी सारी दुनिया , मुनिया सोची घड़े बेच कर पैसे कमाएगी , पर नहीं जानती थी दुनिया उसकी हँसी उड़ाएगी , कैसे वे घड़े को बेचे , सोच में वो डूब गई , एक घड़े को पाँच में देगी , ऐसा फैसला कर गई। वो बेचारी नन्ही सी जान , दुनिया को नहीं होता उसपर शान , सुबह - सुबह वो बैठी , ला घड़े को रख , लोग इधर से गुजरे , पर नहीं आए एक वक़्त , एक ग्राहक आया, इसी ओर , उसे चाहिए...

कविता : "बस ! आत्महत्या "

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(आत्महत्या जितना भारी शब्द हैं , उतना ही भारी बोझ लिए रहता है। जीवन एक युद्धक्षेत्र है और हम उसके योद्धा , अगर मुश्किलों को देख , हार मान ले, तो मौत हर पल तैयार है हमें निगलने के लिए। वास्तव में कठिन परिस्थिति हर एक मनुष्य के जीवन की सच्चाई है , जो उस वक़्त संयम और समझ - बूझ के साथ काम लेता है उसे आत्महत्या जैसी कायरता कभी छू भी नहीं पाएगी। लेकिन एक सच्चाई यह भी है की आत्महत्या करने के लिए असीम ताक़त की आवश्यकता होती है अर्थार्त वह वक्ति मुश्किलों का सामना करने के लिए बलवान है। किन्तु फिर भी जीवन त्यागना ही एक मात्र विकल्प क्यों ? ईश्वर ने सबकी जन्म और मृत्यु सुनिश्चित की है फिर स्वयं इसका फैसला क्यों? इस कविता के पीछे मेरा उद्देश्य है की सबको मनुष्य जीवन नहीं मिलता और हमें इसका सम्मान करना चाहिए। कठिन समय केवल धैर्य और कर्म से पार किया जा सकता है , आत्महत्या तो जीवन के हर सुखद पहलु की भी हत्या कर देता हैं। मेरा सविनय निवेदन है अगर ऐसी किसी परिस्थिति में आप या आपके जानने वाले फसें हो तो तीन बातों को याद रखे - ईश्वर आपके साथ है , समय हर पल का समाधान है और अपन...

कविता : "ये मेरा धर्म , ये तेरा धर्म"

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(आज धर्म , जात - पात हमारे रगों में इस कदर समा चूका है जो दीखता तो नहीं पर सहसा महसूस किया जा सकता है। धर्म की सुई पूरे विश्व को अपने चपेट में ली हुई है , ये कहना गलत होगा की इसके अस्तित्व से सिर्फ मनुष्य जाति को हानि हुई है। इसने हमें नियम , अनुसाशन , सात्विक ज्ञान , ईश्वर की आराधना और विभिन्न कामों से जोड़ कर रखा है , जब तक ये हमारे मस्तिष्क में हावी नहीं होता , तब तक इसकी उपस्थिति सही लगती है। किन्तु आज बढ़ते धर्म और एक धर्म के अंदर कई जात - पात समर्थक दूसरे इंसान का लहू बहाने में भी हिचकते नहीं , उदहारण स्वरुप : ISIS, IM, LeT, Boko Haram, इत्यादि आज आतंकवाद का रूप ले चुके है और निर्मम हत्या करना अपनी ताकत की नुमाईस बना लिए है।  अगर इसे आज रोका नहीं गया तो वो दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया खुद को धर्म के नाम पर खत्म कर लेगी । मानव जाति का असली धर्म सिर्फ इंसानियत को ज़िंदा रखना है और उसका संरक्षण करना है। उम्मीद करती हूँ की वक़्त निकलने से पहले सब इस बात को जान ले। Raise your voice for this slogan " No religion. No fight, India is one, let be unite...