कविता : "भूले - बिसरे दोस्त"


वक़्त और हैं , दौर और था ,
उस समय मैं  बच्ची थी, आज  बात और हैं। 
लेकिन आज भी वही मासूम दिल लिए घूमते हैं ,
वही पहले वाली मुसकान बरक़रार हैं ,
कुछ भूली नहीं इस बात का फक्र नहीं ,
ख़ुशी इस बात की है - की तुम मुझे याद हो और मैं तुम्हे याद हूँ। 



चलो एक बार फिर मिल ले गले , थोड़ा साथ हँस ले और थोड़ा रो ले ,
फिर गलती करे और कुछ नया सीख जाए , अंदर के बच्चे को फिर से जगाये ,
दोस्ती की बोतल चलो खोल ले की बहुत बातें अभी बाकी है ,
कि रातों को आज सोना नहीं और दिन भी हमारा गुलाम हैं ,
दोस्ती में यही तो ताकत है की किसी का इसको डर नहीं , सब का इसको सलाम हैं।
कुछ भूली नहीं इस बात का फक्र नहीं ,
ख़ुशी इस बात की है - की तुम मुझे याद हो और मैं तुम्हे याद हूँ।



आज तो अपने भी समझते नहीं , मुद्दे भी बे तोड़ हैं ,
अभी आतंकवाद ही सुलझा नहीं की हम रिश्तो में उलझे हैं ,
देश को लोग जात - पात के नाम पर बाँट रहे ,  हम तो अपनों  को ही एक करने में लगे हैं।
इन सारी उलझन को एक बार भूला दे , दोस्तों के साथ चलो ग़म में भी मुस्कुरा ले ,
ऐ दोस्त ! फ़िर से मस्ती करे , हर किसी की नक़ल उतार ले ,
भूले - बिसरे दोस्ती की पुकार करती हूँ ,
कुछ भूली नहीं इस बात का फक्र नहीं ,
ख़ुशी इस बात की है - की तुम मुझे याद हो और मैं तुम्हे याद हूँ। 











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