कविता : " राह "


(यह कविता राह पर लिखी  हुँ जिसका उद्देश्य आज के पीढ़ी को आईना दिखाना हैं। आत्महत्या कर वो युवा शक्ति को तार - तार कर रहे हैं , मुश्किलों से भागना रास्ता नहीं , हिम्मत कर के इसका सामना करना चाहिए क्योकि वही नए भारत का स्वरुप बदल सकते हैं। ऐसे में उन्हें नशाखोरी ,  सामाजिक कुरीतियों से दूर रहना चाहिए और नव भारत का दृढ संकल्प के साथ निर्माण करे।)



मैं राह , मस्त चाल में चलता हूँ ,
किधर है जाना , ये सबको बतलाता हूँ ,
खुद में  मैं ऐसा  बनता हूँ ,
हर जगह घूम फिर कर आता हूँ,
मैं ही राही को मंजिल तक पहुँचता हूँ।

मैंने हँसकर सब से बोला , रोना कभी ना सीखा हैं ,
छूटा एक मंजिल , आगे कई राह मैंने सींचा हैं ,
कई है आए कई गए ,
इस पथ से ही सब गुजरे ,
चाहे गांधी , अकबर हो या कबीर ,
इसी राह से सबने बनाई हैं अपनी तक़दीर ,
हमने देखी खूने और तलवारे ,
हमने देखी अंग्रेज़ो की आत्याचारे ,
देखी हैं खून से सनी लोगों के शरीर ,
पर मार लिया मंन को , यह कह कर की यही थी उनकी तक़दीर ,

हमने देखी पुरानी और नई पीढ़ी ,
कैसे चढ़ी थी मानवो ने सारी सीढ़ी।
मुझे बदला ,खूब बदला।
छोटी को लंबी और टूटी की मरम्मत करवाई ,
फिर खूब बतासे और मिठाई बटवाई।
देख ख़ुशी के रंग में , मैं भी रंग गया ,
भूली सारी बातें जो गुजर गया।

हमने खेली होली और चमकती दिवाली ,
हमसे होकर गुजरी है डोली और दुल्हन की विदाई ,
हम पर से कई शव गए है , भरे आँखो में रिश्तों की जुदाई।
कई शूर गए है इस पथ से और देखी है टक - टकी लगाते दरवाजे ,
खूब पड़ी गर्मी , सर्दी और हुई भीषण बरसाते।

तुमने सुन ली मेरी कहानी ,
पर भूला एक बात , जो जरूरी थी बतानी ,
समय जो मिला है तुझको , नहीं चाहिए तुम्हे इसे गवानी ,
छोड़ो गंदे काम सभी , करो मत बईमानी ,
भूल जा सब कुछ , जो तुमने की थी नादानी।

जा सच्चे पथ पर जा , मैं हूँ तेरे साथ ,
तुम भी चलते , मैं भी चलता , यही है मेरा सौभाग्य।। 

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