कविता : "सोच"


(कहते है बदलाव प्रकृति का नियम है किन्तु मनुष्य के जीवन में बदलाव उसकी सोच का द्योतक हैं। आज जो समाज हम देखते है ऐसा पौराणिक काल में नहीं हुआ करता था। मानसिकता में बदलाव लाना इस दुनिया की सबसे जटिल प्रक्रिया है और जो ऐसा कर पाते है, वही समाज सुधारक कहलाते हैं। हम कुछ भी अलग करने से पहले , दूसरे की क्या प्रतिक्रिया होगी ऐसा सोच कर रुक जाते है किन्तु ये भूल जाते है की किसी भी अच्छे और परम्परागत तरीकों से भिन्न कामों को करने से पहले विरोधाभाषों का सामना करना ही पड़ता है। समय के साथ इसे स्वीकारना अनिवार्य हो ही जाता हैं। इस कविता से मेरा गंतव्य इसी बदलाव की ओर सम्पूर्ण मानव जाति को लेकर जाने का हैं। बदलते समय के साथ आप बदलाव के द्योतक बने , बदलाव को स्वीकारे और इस बात पर हमेशा ध्यान दे की बदलाव अच्छे के लिए हो रहा हो। अंततः जीवन का मार्ग मृत्यु पर ही ख़तम होता है और हर बदलाव जीवन को बेहतर करने के लिए किया गया हो इसपर सर्वथा ध्यान रहे। )




सोचता है क्या मानव, इस सारे संसार को ,
जाग उठा है जग, अब तू भी जाग ज़रा ,
मीठी वाणी छोड़, तू भी बन जा कड़ा - कड़ा,
ईश्वर के वरदान से, भर ले तू अपना घड़ा,
जा कर अम्बर चीड़ , मेघ को तू बरसा ,
सोचता है क्या मानव, इस सारे संसार को ,
जाग उठा है जग, अब तू भी जाग ज़रा।

हर क्यारी - क्यारी गाती फूलों के गुण - गान को ,
फूलों के रस को ले, भवरा अपने मन को भड़ा,
मानव अब तेरी बारी है, जा चुन ले जो भी है पड़ा ,
अमृत नहीं तो विष ही ले ले, जो भी दे रही है धरा ,
 सोचता है क्या मानव, इस सारे संसार को ,
जाग उठा है जग, अब तू भी जाग ज़रा।

मंगल  मंगल सब का कल्याण हो ,
ऐसी सोच को तू अपने में बढ़ा ,
जग झूठा तू सच्चा, ऐसी सोच अपने में जगा ,
साँच झूठ के बंधन को छोड़ ,
ईश्वर की प्राप्ति में तू लग जा ,
सोचता है क्या मानव, इस सारे संसार को ,
जाग उठा है जग, अब तू भी जाग ज़रा।

अंत किससे करूँ इस कविता को ,
"सोच" इसका नाम रख , मैँ खुद सोच में पड़ गई ,
अपने को मानव सोच और बन जा बड़ा ,
तेरी सुधी लेगा तू ही, क्योंकि सोच पर है, ये जग टिका।।








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