"तीन शब्द तलाक़ के"

(मेरे इस लिखें कविता के शीर्षक से लक्षित हैं की बातें तलाक़ की हो रही हैं। "तीन शब्द तलाक़ के" - से मेरा अभिप्राय हमारे मुस्लिम समाज के तलाक़ लेने के तरीक़े को एक औरत के दृष्टिकोण से समझाया गया हैं। आज के तेज़ी से भागती ज़िन्दगी में जो बदलते समय में काफी तेजी से बदल रहा - ऐसे में अगर महिलाएं बदलाव का लाभ ना उठा सके तो उस तरक़्क़ी को हाय हैं ! तीन शब्द तलाक़ के , हमारे समाज में महिलायों को पुरुषों से हीन , भयभीत और आधीन बनाता हैं। वास्तव में आज भी मुस्लिम समाज का बहुत कम वर्ग ही असल तरक़्क़ी का स्वाद चख सका हैं। अब भी काफी आबादी अज्ञानता , धार्मिक बंधन , रूढ़िवादिता और महिलायों को केवल परदे के पीछे ही देखना चाहता हैं। किसी भी धर्म में अगर महिलायों पर बंधन लगाया जाए , उससे उनकी असहजता साफ़ लक्षित होती हैं। हमारे समाज को बदलाव की जरुरत हमेशा पड़ेगी क्योंकि बदलाव सिर्फ़ मानसिक बदलाव से लाया जा सकता हैं। तलाक़ शब्द बहुत छोटा हैं परन्तु इसके प्रभाव असल ज़िन्दगी को अंदर से झंझोर देते हैं। इसमें दोनों ही पक्ष को मानसिक तौर पर चोट लगती हैं। ग़लती चाहे एक ही पक्ष की हो मगर ज़िन्दगी दो की बदलती हैं और अगर बच्चे हो तो उनकी बदलाव की कल्पना भी नहीं की जा सकती। तलाक़ के इस तरीके को हमारे मुस्लिम महिलाओं की आवाज़ चाहिए और मुस्लिम पुरूषों का साथ ताकि इसे पूर्णतयः खत्म किया जा सके। एक आवाज़ ही बदलाव का द्योतक हैं और एक बदलाव ही इतिहास रचियता। )
                                                        
                               
                              
दर्द है बहुत सीने में , बयां करूँ कैसे ,
तीन शब्द तलाक़ के मिटाऊं कैसे। 

मैंने विश्वास कर थामा था हाथ तुम्हारा ,
तुम्हारे संग बिताई यादें , भुलाऊं कैसे। 

नोक - झोक , छोटी - मोटी तकरार ही तो थी ,
रूठे पिया को मनाऊं कैसे,
तीन शब्द तलाक़ के मिटाऊं कैसे।

प्यार बेसुमार था कि इलम ना था जुदाई का ,
यूँ तो अब भी आस बाकी है , तेरे आने की ,
पर ना तू आया, ना ही तेरी वफ़ाएं याद आयी । 
तेरे  कटु वचन अब भी गुंजते है कानों में ,
ऐसे में , पिया तेरे संग प्रीत निभाऊं कैसे, 
तीन शब्द तलाक़ के मिटाऊं कैसे। 

अब केवल मेज़ और मेरी तनहाई हैं ,
ऐसे में , आँखों में आँसू छुपाऊं कैसे ,
तीन शब्द तलाक़ के मिटाऊं कैसे। 
तीन शब्द तलाक़ के मिटाऊं कैसे।





Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

कविता : "ये मेरा धर्म , ये तेरा धर्म"

कविता : "बस ! आत्महत्या "