"दुनिया" - एक कटी आलोचना

(इस कविता का उद्देश्य समाज के बदलते रूप में बदलते लोगो की कहानी हैं। हम वास्तव में खुद से ज्यादा दूसरो की सुनते हैं और "लोग क्या कहेंगे" में उलझा लेते हैं। कविता में "मुनिया " उन सभी को संबोधित करती  है जो मेहनत कर एक - एक पैसे को कमाते है और "दुनिया" उस संमाज के लोगो को जो केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचते है और मुनिया को बदलने पर विवश कर देते हैं। अंततः जीत सिर्फ डार्विन के उस सिद्धान्त की होती है, जो कहता है - " survival of the fittest" । जानना ये जरुरी है की हमे अपने अधिकारों का बोध है या नहीं क्योंकि अधूरे ज्ञान से बेहतर है शांत रहा जाए और सीख कर आगे बढ़ा जाए। )


एक थी मुनिया और दूजी सारी दुनिया ,
मुनिया सोची घड़े बेच कर पैसे कमाएगी ,
पर नहीं जानती थी दुनिया उसकी हँसी उड़ाएगी ,
कैसे वे घड़े को बेचे , सोच में वो डूब गई ,
एक घड़े को पाँच में देगी , ऐसा फैसला कर गई।

वो बेचारी नन्ही सी जान ,
दुनिया को नहीं होता उसपर शान ,
सुबह - सुबह वो बैठी , ला घड़े को रख ,
लोग इधर से गुजरे , पर नहीं आए एक वक़्त ,
एक ग्राहक आया, इसी ओर ,
उसे चाहिए थे घड़े, बहुत ज़ोर ,
दाम सुनकर शिहर गया ,
देख मुनिया को ठग लिया।

हाय रे दुनिया ! कितनी बदल गयी ,
गरीबो का पसीना चूस गई ,
दुनिया ने खूब ठगा , मुनिया थक कर हार गई।
फ़िर भी मुँह से कुछ ना बोली ,
बदलती दुनिया में खुद को बदल ली ,
देख लो  इस दुनिया को ,
ठगी सारी मुनिया को ,

मुनिया ने कमर कस ली , दुनिया को सबक सिखाएगी,
जो भी ग्राहक आए , पाँच में नहीं दस में बेचीं ,
दुनिया का मुँह बन गया और मुनिया खूब हँसी ,

दुनिया का तो काम हैँ कहना ,
फरेब करना और मजा लूटना ,
पर हे जग जीवो ! चूप करना है इसे ,
तो इसकी बात ना सुनो।
अपने जीवन को ख़ास चुनों।

पर दुनिया का जब ना कुछ कर सको ,
तो कोरे कागज़ के समान , अपना मुँह बंद रखो।

ऐसी ही हैं ये दुनिया , बोलोगे तो चूप रहेगी ,
चूप रहोगे, तो कहर उठाएगी। ।

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