"प्यारा सपना "
(यह एक बहुत ही सामान्य सी भावनओं को दर्शाती हुईं कविता हैं। आँखें बंद करते ही हमें सपने दीखते है जो उठती आँखों के साथ धुंदले हो जाते है। हर उम्र के लोग के सपने देखने का अगल अर्थ होता है यहाँ तक की विभिन्न सपनों के विभिन्न अर्थ होते हैँ। सपने कई ऐसे होते है जिन्हें पूरा करना जीवन का उद्देश्य बन जाता है इसलिए सपने देखे ऐसे जो आपके भविष्य को उज्वल कर दे। )
मैंने भी देखा है एक सपना ,
कुछ अधुरा , कुछ पूरा ,
कितना सजीला , कितना चमकीला।
सोते ही अपने सपनो की शैय्या पर ,
सुन्दर स्वप्न की टोली घूमने लगी अपनी नैय्या पर ,
देखा मैंने युद्धकाल के शौर्य जवानों को ,
कुछ किसानों , तो कुछ मेजबानों को ,
सुना मैंने क्रिकेट का शोर ,
और देखा फिल्मों के लिए लोगों की होर ,
कितना प्यारा , कितना काल्पनिक था ,
ये सपना नहीं , मानो मार्मिक था ,
कभी मैंने विदेश को देखा तो कभी देश को ,
कई लोगों को और उनके कई रूप को देखा ,
कितना छलावा , कितना नकलीपन था,
पर मेरी दुनिया के पास तो रोमांच और सचाई भड़ा मन था।

हर बेला को छूता , हर सरगम को गाता ,
प्रकृति के साथ खुद को नचाता ,
खुद को पंछी की तरह , हर जगह उड़ाता।
अब बाड़ी थी , नए जगह जाने की ,
पर ये कैसा शोर , दे रहा था चेतावनी कोई, मुझे अपने दुनिया में आने की ,
आँख खुल गई , भोर हो गई ,
माँ के आँचल का हल्का सा साया मिला ,
पर तन भले ही यहाँ पर हो ,
पर मन तो सपनों की दुनिया में छलांग लगाता रहा ,
फिर से रात आई ,
सपनों की रात छाई ,
फिर वही भींगे सपनों की बेला ,
और हर जगह मेला ही मेला।
देखा है मैंने एक प्यारा सपना , जो लगता है कुछ अपना - अपना।
मैंने भी देखा है एक सपना ,
कुछ अधुरा , कुछ पूरा ,कितना सजीला , कितना चमकीला।
सोते ही अपने सपनो की शैय्या पर ,
सुन्दर स्वप्न की टोली घूमने लगी अपनी नैय्या पर ,
देखा मैंने युद्धकाल के शौर्य जवानों को ,
कुछ किसानों , तो कुछ मेजबानों को ,
सुना मैंने क्रिकेट का शोर ,
और देखा फिल्मों के लिए लोगों की होर ,
कितना प्यारा , कितना काल्पनिक था ,
ये सपना नहीं , मानो मार्मिक था ,
कभी मैंने विदेश को देखा तो कभी देश को ,
कई लोगों को और उनके कई रूप को देखा ,
कितना छलावा , कितना नकलीपन था,
पर मेरी दुनिया के पास तो रोमांच और सचाई भड़ा मन था।

हर बेला को छूता , हर सरगम को गाता ,
प्रकृति के साथ खुद को नचाता ,
खुद को पंछी की तरह , हर जगह उड़ाता।
अब बाड़ी थी , नए जगह जाने की ,
पर ये कैसा शोर , दे रहा था चेतावनी कोई, मुझे अपने दुनिया में आने की ,
आँख खुल गई , भोर हो गई ,
माँ के आँचल का हल्का सा साया मिला ,
पर तन भले ही यहाँ पर हो ,
पर मन तो सपनों की दुनिया में छलांग लगाता रहा ,
फिर से रात आई ,सपनों की रात छाई ,
फिर वही भींगे सपनों की बेला ,
और हर जगह मेला ही मेला।
देखा है मैंने एक प्यारा सपना , जो लगता है कुछ अपना - अपना।
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