"मेरे जीवनसाथी "

(इस कविता को मैं अपने प्रमुख़ रचनाओं में से एक कहुँ तो गलत नहीं होगा। अकसर बातें जवानों की होती हैं परन्तु जवान अकेला नहीं जाता हैं किसी के जीवन के रंग भी उसके साथ जाते हैं। इस कविता के माध्यम से मैं उनके जीवनसंगिनी की भावनाओं को शब्दों से बयां करने का केवल कल्पना मात्र प्रयास की हूं। उम्मीद हैं थोड़े से कुछ अंश उनकी भावनाओं के जुबान बन रहे हो। देश की रक्षा उन जवानों के कंधो पर होती हैं और घर की कमान उनके साथी के। कई बातें दोनों के बीच अधूरी रह गयी हो और कई इक्षाएं बेजुबा। ऐसी कुछ बंधन भी दिखाती हैं कविता "मेरे जीवनसाथी " । )





दिन - रात तकती मेरी आँखें ,
की कब चौखट पे पैर रखो।
सज - सवर रखती खुदको ,
की कब तोरी नज़र परे मुझको।


तेरी खाखी वर्दी में , छाती है फौलाद का ,
आँखें तेरी खोजे मुझे , जब तम्मना हो औलाद का ,
जानू तेरी नौकरी , मुझे ना भाएगी ,
तेरे ना होने का दर्द , मुझे हमेशा सताएगी।


ओ 'मेरे साथी ', फिर भी मैं उम्मीद रखूँगी ,
कि जल्द तू आएगा , कभी सिर्फ मेरे खातिर ,
तेरी पहली नज़र , मेरे सिंगार पर पड़ेगी ,
उस फौलाद से सीने में , तू मुझे भरेगा ,
'तुम इतनी सुन्दर हो ', ऐ बात सुन, मैं शर्माऊँगी ,
पर उस रात की बात , अचानक से याद आ गई ,
'तुम सुन्दर हो' पर 'भारत माता की सुंदरता मुझे पहले से भा गई',
ऐसे ही ख़यालों के साथ , मैं अपने ख़यालों से बाहर आ गई।


मैं दौड़ी दरवाज़े की ओर , दस्तक़ था बहुत ज़ोर ,
खुद को आईने में देख , दौड़ी तेरे इस्तकबाल के लिए ,
तू मुस्क़ुरा रहा था , आँखें नम थी ,
एक पोटली कागज़ की थी , जिसमें मेरा ही सिर्फ ज़िक्र था ,
पर तू स्थिर था।



चार जवानों ने ठोखी सलामी और हमेशा के लिए तुम्हें मेरे पास छोड़ गए ,
बच्चा तेरा रोते पूछा , "पापा चल बसे? " ,
मैंने कहा - " जिनकी नज़र मुझपर पड़ी नहीं ,
हर तम्मनाओं से दूर हो जाते हैं ,
भारत माता की सेवा में जो अपने प्राण गवाते हैं।
बेटा तेरे पिता शहीद कहलाते है। "




उस कागज की पोटली में , मेरे जीवन के सारे वर्ष थे ,
प्यार आँखों से नहीं , तुमने शब्दों से बयां किए थे ,
जानू तेरी नौकरी , मुझे ना भाएगी ,
तेरे ना होने का दर्द , मुझे हमेशा सताएगी।


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