कविता - "प्रकृति"


(इस कविता को मैंने प्रकृति और मानव जाति के बीच के वार्तालाप के रूप में दर्शाया है।)


(प्रकृति का मानव जाति से वार्तालाप )

रच बस सकती हूँ ,
मैं उजड़ भी सकती हूँ ,
हे मानव ! मुझको पहचानो ,
क्योंकि मैं बदल भी सकती हूँ।

कूट -कूट कर रस भरा है मुझमें ,
ले लो और पहचानो ,
शक्ति है ऐसी तुझमें ,
वक़्त निकलने से पहले मुझको जानो।

मुझमें ही परमेश्वर है ,
मुझमें ही धरती और अम्बर है ,
मत करो बर्बाद हमें ,
हमने किया है आबाद तुम्हें।

हरियाली हमसे होती है ,      
खुशहाली हमसे होती है ,
हमें चाहोगे तो धरती है सोना ,
नाश करोगे तो तुम्हें पड़ेगा सब कुछ खोना।

कुछ नहीं है बीता ,बचा हुआ है वक़्त ,
इससे पहले की हम हो जाए सख़्त ,
बहा दो हमारे लिए रक्त।
तभी देंगे तुम्हें छाया हर वक़्त।

हमें बर्बाद करना छोड़ दो ,
अपने हाथो को रोक लो ,
इससे पहले कि हम बरस पड़े ,
अग्नि में तुम्हें भस्म करे ,
हमें तुम पहचानो ,
वक़्त निकलने से पहले हमें जानो।

(मानव का प्रकृति से वार्तालाप )


थक कर मैं हार गया ,
इस प्रकृति ने हमें मार दिया ,
भूल हुई जो मानी ना चेतावनी ,
और हमने कर ली एक नादानी।
पर कौन है आप - हमारे परमपिता या जननी।


अंत में ,मैं कहती हूँ , मैं हूँ प्रकृति ,
बदल सकती हूँ अपनी आकृति ,
तुमने हमें सही पहचाना ,
जा मानव हमने तुम्हे अपने लायक माना ,
पर अब मत भूल करना ,
हमें गंदा धूल न देना ,
तब ना तुमको माफ़ करेंगे ,
और खुदको तुमसे साफ़ करेंगे।

इसलिए मैं कहती हूँ ,मैं हूँ प्रकृति ,
बदल सकती  हूँ अपनी आकृति।।










Comments

  1. Very impressive. I understand your ability. It's a happy moment for me. Go ahead. keep it up. God bless you. My blessings with you.

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