"मेरा चंद्रबिंदु "
(चंद्रबिंदु - शब्दों की ऐसी शोभा जो केवल लिखने भर तक सीमित थी , आज मेरी कविता का ऐसा नायक है जो अपनी प्रासिंगता बता रहा हैं। ये शब्दों के ऊपर लहलहाता है और एक छिपा हुआ ज्ञान दे जाता हैं । सबके जीवन में सफलता - विफलता होती है और समय भी एक जैसा नहीं होता। वैसे ही परिस्थिति में तनाव घर कर लेता है और हमें दीमक की तरह अंदर से खोखला बना डालता हैं। अतः हमें अपने जीवन के सफलता , गुण , प्रतिभा रूपी चंद्रबिंदु को सदैव याद रखना चाहिए ताकि बुरे समय में भी खुद पर किया गया भरोसा और धैर्य, हमसे अच्छे समय का निर्माण कराए।)
चमकते ललाट पर शोभा देता हूँ।नीचे उतारो तो आधा दीखता हूँ।
मेरा स्वर गुंजेयमान और आकार है गोल सामान।
मैं सिर्फ बिंदु नहीं , मैं हूँ "चंद्रबिंदु" का अभिमान।
हर मनुष्य के जीवन में मेरा अश्क हैं ,
सफलता बन , मैं उसके अँधेरे - अधुरे समय में बिंदु बन चमकता हूं ,
इस आस में कि काले बादल जीवन के हट जाएंगे ,
और आशा की किरण , मुझसे अपना श्रृंगार करेगी ,
मैं निराशा का उस योद्धा की तरह वार करूँगा ,जो धरातल से ऊपर उठ कर निशाना साधा करेंगी।
स्त्रीयों के माथे का मुकुट हूं ,
मैं उनकी असहजता नहीं , उनके महानता का द्योतक हूं ,
मेरा स्वर गुंजेयमान और आकार है गोल सामान।
मैं सिर्फ बिंदु नहीं , मैं हूँ "चंद्रबिंदु" का अभिमान।
मैं आसमान में चमकते उस चंद्रमा की तरह हूं,
काला हो कर भी , अँधेरे में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हैं।
मेरी चमक आकाश की बिंदिया है ,
और चौदहवीं के चाँद से चमकती सारी दुनिया हैं।यूँ तो इस ब्रह्मांड में अस्तित्व है छोटा सा ,
मगर सूर्य को ढक दूँ, तो ग्रहण लग जाता ,
मेरी आकार पर मत जाना , याद रखना ,
शब्द बिना मुझे छुए ही पूरा होता हैं ,
क्योंकि रात के बाद ही सवेरा होता हैं।
इसलिए अपने जीवन के चंद्रबिंदु को जगमगाने दे ,
अपने ललाट को ऊँचा रख और वक़्त तेरा भी आने दे।
फिर सफलता बन , मैं तेरे जीवन में जगमगाऊँगा ,
हार भी गया तो क्या , आत्मविश्वास बन, फिर भी गुनगुनाऊंगा ,चाहे कितने भी काले बादल मुझे ढके ,
फिर भी मैं, शब्द के ऊपर ही लिखा जाऊंगा।
अगर बुरे वक़्त ने नीचे गिरा भी दिया, तो भी, आधा आकार ले, अपने होने का एहसास कराऊंगा।
मेरा स्वर गुंजेयमान और आकार है गोल सामान।
मैं सिर्फ बिंदु नहीं , मैं हूँ "चंद्रबिंदु" का अभिमान।
umda
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